रावण

                                     रावण

खुद ही ला खड़ा करते हो..
खुद ही मारते हो...
कभी अंदर झांक के देखा
कितने रावण पालते हो...?
धर्म की जीत कहते हो इसे...
और अधर्म की हार...
धर्म क्या सिर्फ राम ने जाना था...?
सीता के पल्लू को भी ना छू के क्या मैने
अधर्म किया था?
सदियो की एक तपस्चर्या थी...
वरदान था शिव जी का...
विश्वविजेता था मै...और ज्ञानी इस तल का...
पर अहंकार से लतपत...ईर्ष्या से भरा हुआ...
अंजाम पता था, फिर भी जिद पे अड़ा हुआ...
और इस क्रोध की अग्नि में,
मै रावण जला हुआ...
इन सारे पापो का प्रायश्चित मिला था मुझे...
मेरे अहम का सर्वनाश करके राम ने मुक्त किया था मुझे...
मैं अधर्मी नही था...नाही मै कोई व्यभिचारी था...मैं था
दशानन...
जो दस मुखों से भी सत्य को नही देख पाया था...
और आज भी यही हो रहा है...
हर एक में कोई रावण छुपा हुआ है...
बोलो कब उसे मारोगे...
किस दशहरे मे उसको जलावोगे...
आज सिर्फ मैं ही खड़ा हूँ,
और मरने का डर आज भी मुझे नही है...
मन मे व्यथा सिर्फ यही है,
मुझे मारने वाला आज राम नही है...
मुझे मारने वाला आज राम नही है...
                                                  -अभि
 



Comments

  1. What a beautiful blog on this occasion👌...gr8

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  2. Abhijeet as always U have come up with the new informative post.. people don't know that what रावण had done..n how he was? N what he was? the way you have presented will surely help to change the mindset of young blood and those who are reading this informative blog ...I'm sure this information will help us to add to our knowledge... Tysm n it's appropriating Abhijeet ... Bless you ... N happy dashera to everyone.. 😇👏✍👣✌

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  3. Awsome blog!!! Keep this good work up and sharing different preceptions with us!!!

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