झंडा...
"सिग्नल पे झंडा बेचनेवाले उस
लड़के की आंखों से आंखे नही मिला पाया...
उन कागज के तीन रंगों मे
हमारे अमन और एकता का रंग नजर ही नही आया...
इसीलिए शायद,
मैं आज झंडा नही खरीद पाया...
एक दिन की देशभक्ति के बाद
यही कही मिल जाएगा सड़क पे पड़ा हुआ...
आज कल हर रोज देखता हूं उसे
किसी शहिद के बदन पे लिपटा हुवा...
इसीलिए शायद,
आज मैं झंडा नही खरीद पाया...
इसका मुझे कोई गम नही...
की उसे मैं खरीद नही पाया...
क्योंकि वो मुझे मिल जाएगा...
मेरी बचपन की यादों में..
देश पर मर मिटने वाले वीरो की
शहादत में..
खिलते हुवे इन खेत और खलयानो में..
हसते हुवे उन देश के भविष्य की
आंखों में..
वो मुझे मिल ही जायेगा...
इसीलिए शायद,
आज मै झंडा नही खरीद पाया..."

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